आजमगढ़इतवाउत्तर प्रदेशकुशीनगरगोंडागोरखपुरबस्तीबहराइचबाराबंकीलखनऊसिद्धार्थनगर 

बस्ती में शिक्षा के नाम पर ‘शुद्ध लूट’: प्राइवेट स्कूलों की किताबों में छुपा है 500% कमीशन का खेल!

NCERT किनारे, कमीशन प्यारे: प्राइवेट स्कूलों ने अभिभावकों को बनाया 'दुधारू गाय'।

अजीत मिश्रा (खोजी)

✍️विशेष रिपोर्ट: बस्ती के ‘शिक्षा-माफिया’ और अभिभावकों की ‘किस्त वाली’ मजबूरी✍️

🏫महंगी किताबों का ‘जहरीला जाल’: बस्ती के स्कूलों में बच्चों का भविष्य नहीं, जेब तराशने की मशीन चल रही है।

🏫सरकारी आदेश हवा-हवाई, बस्ती के निजी स्कूलों की ‘अपनी ही दुहाई’।

🏫बधाई हो बस्ती! आपके बच्चे को ‘ज्ञान’ नहीं, ₹300 वाली 200 पन्नों की ‘रईसी’ पढ़ाई जा रही है।

🏫शिक्षा का नया सिलेबस: ‘प’ से पढ़ाई नहीं, ‘क’ से कमीशनखोरी और ‘ड’ से ड्रेस वाली डकैती।

🏫स्कूल है या शोरूम? जूते से लेकर मोजे तक पर फिक्स है ‘प्राइवेट गुरुओं’ का हिस्सा।

🏫कमीशन की ‘गंगा’ में डूबा प्रशासन: क्या बस्ती के अफसरों को नहीं दिख रही ये खुली लूट?

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। शिक्षा दान है, संस्कार है, और अब… एक शानदार ‘कॉर्पोरेट बिजनेस’ भी है! बस्ती जिले के प्राइवेट स्कूलों ने इस साल फिर साबित कर दिया है कि वे बच्चों का भविष्य बाद में संवारते हैं, पहले अपना ‘कमीशन’ संवारते हैं। अगर आप अभिभावक हैं, तो बधाई हो! आप किसी स्कूल के लिए चलते-फिरते एटीएम मशीन (ATM) से कम नहीं हैं।

🔔NCERT का ‘श्राद्ध’ और प्राइवेट पब्लिशर्स का ‘श्रावण’

सरकार चिल्लाती रह गई कि NCERT की किताबें लगाओ, जो सस्ती और मानक हैं। लेकिन प्राइवेट स्कूलों को तो ‘मलाई’ पसंद है। 256 पन्नों की जो किताब NCERT के रेट पर चंद रुपयों में मिल जानी चाहिए थी, वह निजी प्रकाशकों के कवर के साथ ₹300 से ₹500 के बीच झूल रही है।

⚡तर्क देखिए: स्कूल प्रशासन का कहना है कि NCERT की किताबें ‘पर्याप्त’ नहीं हैं। शायद उनके हिसाब से ज्ञान तभी आता है जब पन्ने चिकने हों और कीमत पांच गुना ज्यादा हो।

🔔कमीशन का ‘ट्रायंगल’: स्कूल, दुकानदार और आपकी जेब

✍️बस्ती में भ्रष्टाचार का एक नया ‘ट्रायंगल’ विकसित हुआ है।

👉स्कूल: किताब की लिस्ट थमाता है।

🔔निर्धारित दुकान: शहर की वही एक दुकान जहाँ ‘सोने के भाव’ वाली कॉपी-किताबें मिलती हैं।

🔔अभिभावक: जो लाइन में लगकर अपनी मेहनत की कमाई लुटाने को अभिशप्त है।

जूते से लेकर मोजे तक और पेंसिल से लेकर टाई तक, सब कुछ ‘ब्रांडेड’ होना चाहिए। वही ब्रांड, जिसे स्कूल ने कमीशन की डील के बाद फाइनल किया है। अगर आपने गलती से बाहर की दुकान से सस्ती और वैसी ही ड्रेस ले ली, तो आपके बच्चे को स्कूल में ऐसे देखा जाएगा जैसे वह किसी दूसरे ग्रह का अपराधी हो।

🔔ड्रेस में भी ‘डिजाइनर’ लूट

हैरानी की बात है कि स्कूल के ड्रेस अब हर साल बदल जाते हैं। पिछले साल की नीली धारी वाली पैंट इस साल ‘हल्की आसमानी’ हो जाती है। मकसद बच्चों को स्मार्ट बनाना नहीं, बल्कि पुराने कपड़ों को रद्दी बनाना और नए कमीशन का रास्ता खोलना है।

🔔प्रशासन का ‘मौन व्रत’

जिले का शिक्षा विभाग इस पूरे खेल में ‘धृतराष्ट्र’ बना बैठा है। हर साल कागजी आदेश जारी होते हैं, चेतावनी दी जाती है, लेकिन धरातल पर निजी स्कूलों की मनमानी के आगे सब नतमस्तक हैं। शायद कमीशन की गंगा इतनी पवित्र है कि ऊपर से नीचे तक सब हाथ धो रहे हैं।

🔥अभिभावकों का दर्द: “साहब, बच्चों को पढ़ाना है या किडनैपर को फिरौती देनी है, समझ नहीं आता। आधी सैलरी तो अप्रैल के पहले हफ्ते में ही स्वाहा हो जाती है।”

✍️प्रशासन और स्कूल संचालकों से सीधे ‘तीखे सवाल’

⚡मानकों की अनदेखी क्यों? जब सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि NCERT की किताबें अनिवार्य हैं, तो बस्ती के स्कूलों को ‘प्राइवेट पब्लिशर्स’ से इतना मोह क्यों है?

⚡एक ही दुकान क्यों? शहर की चुनिंदा दुकानों पर ही स्कूल की ड्रेस और किताबें क्यों मिलती हैं? क्या यह ‘कमीशन सेट’ करने का खुला सबूत नहीं है?

⚡5 गुणा दाम का आधार क्या? ₹60 की किताब को ₹300 में बेचने का लाइसेंस इन निजी प्रकाशकों को किसने दिया? क्या ज्ञान की गुणवत्ता पन्नों की चमक और कीमत से तय होगी?

⚡शिक्षा विभाग की चुप्पी का राज क्या? हर साल अभिभावक चिल्लाते हैं, लेकिन जिला शिक्षा विभाग केवल ‘जांच का आश्वासन’ देकर पल्ला क्यों झाड़ लेता है? क्या इस कमीशन की गंगा में उनके भी हाथ धुले हैं?

निष्कर्ष: अब जागने की बारी अभिभावकों की है!

बस्ती में शिक्षा का मंदिर अब ‘मॉल’ बन चुका है, जहाँ बच्चा एक छात्र नहीं, बल्कि एक ‘कस्टमर’ है। अगर आज आवाज नहीं उठाई गई, तो कल स्कूल की फीस के साथ-साथ ‘सांस लेने का टैक्स’ भी वसूला जाएगा। प्रशासन की नींद तभी टूटेगी जब अभिभावक संगठित होकर इस ‘सफेदपोश डकैती’ का विरोध करेंगे।

याद रखिए, आप अपने बच्चे का भविष्य बनाने के लिए पैसे दे रहे हैं, किसी स्कूल मालिक की अगली लक्जरी कार की किस्त भरने के लिए नहीं!

Back to top button
error: Content is protected !!